शनिवार, 8 नवंबर 2014

आज का श्रवण कुमार

नेत्रहीन मां को 27 हजार किमी पैदल चलकर कराए चारधाम 17 साल पहले शुरू हुई यात्रा समाप्त जेब में एक रुपया नहीं, चल दिए यात्रा पर ८७ वर्षीय मां को कावड़ में ले जाते हैं कैलाश गिरी उज्जैन (मप्र)त्न 87 साल की नेत्रहीन मां की इच्छा पूरी करने के लिए वह इस कलियुग में श्रवण कुमार बन गया। कैलाश ने जब यात्रा शुरू की तो उसके पास जेब में एक रुपया नहीं था। भगवान भरोसे वह कावड़ लेकर निकल पड़ा और गर्मी, ठंड व बारिश के बीच यात्रा आगे बढ़ती चली गई। जहां भी गया, उस शहर में लोगों ने रहने, खाने की मदद की और कुछ रुपए भी दिए, लेकिन पूरी यात्रा में कहीं कोई सरकारी मदद नहीं ली। अपने कंधों पर कावड़ में मां को बैठाकर 17 साल और कुछ महीनों में 27 हजार किलोमीटर पैदल चलकर उसने चारधाम की तीर्थ यात्रा पूरी करा दी। बरगी (ग्वालियर) के 40 वर्षीय कैलाश गिरि ब्रह्मचारी कावड़ में बैठी मां कीर्ति देवी के साथ सोमवार को जब उज्जैन की सड़कों से गुजरा तो उसे देखने वालों की नजरें थम गईं और बूढ़े मां-बाप को कंधों पर यात्रा कराने वाले पौराणिक पात्र श्रवण कुमार की याद आ गई। कैलाश गिरि ने कहा कि 1995 में क्रम से रामेश्वर, जगन्नाथपुरी, बद्रीनाथ और द्वारिका धाम की यात्रा कर अब उज्जैन में महाकाल दर्शन के साथ यात्रा पूरी की है। हालांकि संकल्प के मुताबिक वह मां को गांव तक कावड़ से ही ले जाएगा। उज्जैन से वह देवास के रास्ते ग्वालियर के लिए रवाना हो गया।

सोमवार, 3 नवंबर 2014

माँ की ममता

जीवन का सच

जब भी अपनी शख्शियत पर अहंकार हो, एक फेरा शमशान का जरुर लगा लेना। और.... जब भी अपने परमात्मा से प्यार हो, किसी भूखे को अपने हाथों से खिला देना। - जब भी अपनी ताक़त पर गुरुर हो, एक फेरा वृद्धा आश्रम का लगा लेना। और…. जब भी आपका सिर श्रद्धा से झुका हो, अपने माँ बाप के पैर जरूर दबा देना। - जब भी अपनी दौलत का अभिमान हो, बाढ़ भूकम्प वाले क्षेत्र से होके आ जाना, और…. जब भी आपको गरीबों पर दया आये, इंसानियत का फ़र्ज़ जरूर निभा आना। - और.... जब भी कभी बच्चों से प्यार हो,, उन्हें उठाकर दिल से जरूर लगा लेना। - जब भी अपने शरीर पर अभिमान हो, एक फेरा अस्पताल का लगा आना, और.... जब किसी अपाहिज को देखके दर्द हो, उसे इंसानियत का अहसास जरूर करा देना। - जब कभी अपने ज्ञान पर अभिमान हो, एक बार मेन्टल अस्पताल होके आ जाना। और.... जब भी आपको अपने ज्ञान का गुमान हो, किसी अशिक्षित को मुफ्त में पढ़ा देना।

तुलसी विवाह की कथा

तुलसी विवाह कथा>>> एक लड़की थी जिसका नाम वृंदा था राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु जी की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा,पूजा किया करती थी.जब वे बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया,जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी. एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा - स्वामी आप युध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते में अपना संकल्प नही छोडूगी,जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी,उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके सारे देवता जब हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास गये. सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता पर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है. भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा,वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा,युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है? उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया,तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई,उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ,भगवान तुंरत पत्थर के हो गये सबी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्राथना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी. उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से इनका नाम तुलसी है,और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा.तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे.और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है.देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है..... --- via #MMSSamvaad

बदहाल किसान

सुना है बहुत सारा अनाज खुले आसमान के नीचे सड़ता है। फिर क्यों एक भूखा , दाने-दाने को तरसता है? नेताओं की आँख का सावन इन मज़लूमों के लिए चुनाव के मौसम में ही क्यों बरसता है ? --- via #MMSSamvaad

ज्ञानदीप

जलता है जब दिया ज्ञान का, दूर अँधेरे होते हैं। ज्ञान को मान मिले दुनिया में, अज्ञानी बस रोते हैं। पढ़ा-लिखा है हीरा जग में, अनपढ़ तो इक पत्थर है। एक का मोल करोड़ों में तो, दूजा पग की ठोकर है। पाते हर सुख ज्ञानी जग में, अज्ञानी बस खोते हैं। इसकी सुनकर उसकी सुनकर, काम बिगाड़ा तूने अपना। तेरी अनपढ़ता के कारण, धोखा देगा तेरा अपना। चलकर केवल ज्ञान के पथ पर, हर सपने सच होते हैं। .......सुरेन्द्र कुमार........ --- via #MMSSamvaad

सदविचार

जो कहता है मैं सबसे बड़ा ज्ञानी हूँ , वास्तव में वही सबसे बड़ा अज्ञानी है। --- via #MMSSamvaad

सदविचार

बुद्धिमान कार्य करने से पहले सोचते हैं और मूर्ख बाद में। 

हमें दिया है धरती ने

हमें दिया है धरती ने, जीवन का ये वरदान सुनो। उसके अहसानों को मानो, मौत के मत सामान चुनो। सुनो धरा पर अगर एक भी, वृक्ष नहीं रह जाएगा। ना तो वर्षा होगी, प्राणी प्यासा ही मर जाएगा। हरियाली खुशहाली चुन लो, मत लोगों श्मशान चुनो। जिस धरती ने तेरे भीतर, प्राणों का संचार किया। उस धरती के सीने में तूने, खंजर से वार किया। अब तो तौबा कर लो, हैवान नहीं इंसान बनो। उसके अहसानों को मानो, मौत के मत सामान चुनो...... .......सुरेन्द्र कुमार...... --- via #MMSSamvaad

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

NUKKAD NATAK


नुक्कड़  नाटक                                                                                                   १)     हर तरफ गन्दगी का ढेर है,
इन लोगों को समझाने में वक्त मत कर बर्बाद-२
चल-चल हो रही देर है.
२) ठहरो-ठहरो ,
ज़रा उधर तो देखो ,
वे लोग अन्न का अपमान कर रहे हैं.
और उधर बच्चे , भूख से तड़प –तड़पकर
मर रहे हैं.
३ )  उस बच्चे ने जितना खाया नहीं , उससे ज्यादा
थाली में छोड़ दिया  है.
अरे, ये क्या हुआ, उस बेबस लाचार माँ ने, अपने फूल से बच्चे को
भूख से बिलखता छोड़ दिया है.
४)  ये बीमार बूँद भर पानी को मोहताज़ है,
और वहाँ तो देखो , वे लोग कितना
पानी बर्बाद  कर रहे हैं ,
लगता है इन लोगों की आँखों में,
न शर्मिंदगी है ,न लाज है. न लाज है.

५ ) ऐसा लगता है , ये सब लोग  स्वार्थी हो चुके हैं ,
इन्हें कल की फिकर नहीं ,
दोनों हाथों से लुटा रहे हैं
जो संसाधन आज हैं.. आज हैं.
६)  सबको अपनी-अपनी पड़ी है,
ये कोई नहीं देखता कि,
 एक माँ के लिए कितनी मुश्किल घड़ी है.
हमारी धरती माँ प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग
के जाल में जकड़ी पड़ी है.
७)जिस माँ ने हमें जीवन दिया,
हमने उसे ही मौत के मुँह पे
लाकर खड़ा किया .
८ ) उस माँ ने तो हर पल हमें अपना समझा ,
और हमने उसके जल, उसके अन्न, उसकी जीवन
दायिनी हवा की बर्बादी को ही
अपनी ज़िदगी का सबसे अहम
सपना समझा.






सोमवार, 14 जनवरी 2013

VIVEKANAND NATAK


                      विवेकानंद  (नाटक)
सूत्रधार : आज हम पश्चिमी संस्कृति के आकर्षण में अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं. जब  देश आजाद हुआ. संविधान निर्माताओं ने बड़े जतन से भारत के लिए संविधान का निर्माण किया .
उन्होंने एक समृद्ध ,संपन्न भारत का सपना देखा. लेकिन हमने उनके सपनों को भुला दिया . आज चारों ओर अशिक्षा, भुखमरी, स्वार्थ ,लालच, गरीबी ,भ्रष्टाचार का ही बोलबाला अपने चरम पर है. हम अपनी संस्कृति से प्रेम करना जैसे भूल ही गए हैं . आज हर तरफ अपने-अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए कोहराम मचा हुआ है. धर्म का सही अर्थ तो जैसे सभी भूल ही गए हैं. ऊँच-नीच का भेदभाव आज भी कायम है. ऐसे में हमें याद आती है उस महान विभूति की जिसने विश्व को भारतीय संस्कृति का लोहा मानने पर विवश कर दिया.       जी हाँ, हम बात कर रहे हैं प्रकाण्ड विद्वान स्वामी विवेकानंद के बारे में. हम सभी ने इनका नाम ज़रूर सुना
है पर भारतीय संस्कृति में उनके अमूल्य योगदान के बारे में शायद कम जानते हैं . आज प्रस्तुत किये जाने वाले नाटक में हम स्वामी जी के जीवन की उन्हीं घटनाओं को आपके सामने रखने जा रहे हैं जिनसे आप उनकी महानता को समझ सकें .अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस से दीक्षा लेने के पश्चात स्वामीजी भारत भ्रमण पर निकलते हैं. अनेक लोग उनके साथ चल पड़ते हैं . अपने शिष्यों को धर्म और ईश्वर का सही अर्थ बताते हुए वे कहते हैं सभी मनुष्यों में एक ही ईश्वर का निवास है . सच्चा भक्त मनुष्यों में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करता.
और ..............
                                   पहला दृश्य
स्वामीजी : ऊपर है वो भी. अखिल विश्व वो दिशातीत वो , विश्वम्बर है. ब्रह्म अमर है, ब्रह्म अजर है .
विश्व का इतिहास कुछ ऐसे लोगों का इतिहास है , जिन्हें खुद पर विश्वास था. विश्वास मानुष के  भीतर छुपे देवत्व को प्रकट करता है. तुम कुछ भी कर सकते हो,तुम तभी असफल होते हो ,जब अपनी अनंत शक्ति को प्रकट करने का पूरा प्रयास नहीं करते.एक व्यक्ति या कोई देश, जब अपने ऊपर से विश्वास खो देता है तो मृत्यु आती है. इसलिए पहले स्वयं पर विश्वास करो..... और फिर ईश्वर पर. मुठ्ठी भर शक्तिशाली लोग.... पूरे विश्व
को हिला सकते हैं . इसलिए साहसी बनो. साहस सबसे बड़ा सदाचार है. हमेशा पूरा सत्य बोलो. बिना किसी भेदभाव के, बिना डरे, बिना घुमाए-फिराए. और बिना कोई समझौता किए........ अब रात हो चली है ...आप लोग अपने घरों को जाएँ, ..... मैं कल फिर आऊँगा,...... यहीं.
(सब चले जाते हैं )
एक व्यक्ति : (डरते हुए) स्वामीजी.....
स्वामीजी : क्या है ?
व्यक्ति : स्वामीजी , आपने कल से कुछ नहीं खाया है. मैं नीच जाति का हूँ स्वामीजी, इसलिए पकाकर नहीं
लाया. आप चाहें खुद ही पका लें, मैं लकड़ी लाए देता हूँ.
स्वामीजी : तुम बहुत दयालु हो ........ आओ ....... बहुत ही दयालु . अरे, तुम इसे पकाकर मुझे दो न .
हम दोनों बल्कि मिलबाँटकर खा लेंगे.
व्यक्ति : पर मैं तो नीच जाति का हूँ स्वामीजी. आप मेरे हाथ का पका कैसे खाएँगे ?
स्वामीजी : तुम मेरे भाई हो, तुममे मुझे भगवान नज़र आता है. देखो,अगर तुम मुझे पकाकर खिलाओगे न,
 तो मुझे लगेगा कि तुमने मेरा सम्मान किया है.... अरे ,नहीं-नहीं.. शक्तिशाली और कमज़ोर, ऊँच और नीच.
 सबके पीछे वही अनंत आत्मा है. जो मनुष्य की अनंत शक्ति को श्रेष्ठ और महान बनाने का आश्वासन देती है. इसीलिए अपने भीतर छिपे हुए ईश्वर की घोषणा करो. उसे अस्वीकार मत करो. जाओ पकाकर लाओ..

सूत्रधार : इसके बाद स्वामीजी महाराज मंगल सिंह के दरबार में जाते हैं. वहाँ क्या होता है चलिए अगले
        दृश्य में देखते है.......
 मंगल सिंह : ( हाथ में बन्दूक लिए हुए) )स्वामीजी,..... सुना है आप बहुत बड़े विद्वान हैं, चाहें तो आराम से
 खा- कमा सकते हैं, फिर आपके हाथ में यह भिक्षा पात्र. हूँ.. किसलिए ?
स्वामीजी : आप राजा हैं , अपना राज-काज भूलकर अंग्रेजों के साथ शिकार और तफरीह में अपना समय क्यों नष्ट करते है........ केवल आनंद के लिए ही न ?
मंगल सिंह : हूँ .हूँ ..हूँ (हँसी) आपके ऋषि मुनि भी अपना सारा जीवन व्यर्थ करते हैं.. पूजा-पाठ और ध्यान में,
केवल अपने आनंद के लिए न.. हूँ ?
स्वामीजी :  किन्तु ,...... एक जानवर भी दूसरे जानवर को बिना प्रयोजन नहीं मारता. फिर.......आप क्यों
मारते हैं उन्हें ? मुझे यह अर्थहीन लगता है.
मंगलसिंह : अर्थहीन , हूँ...हूँ..हूँ..(हँसी) हमें मूर्ती पूजा अर्थहीन लगती है. ये लोहे के टुकड़े ,ये पत्थर,ये लकड़ी,
ये मिट्टी के लोंदे को भगवान मानकर इन्हें पूजना, हमें समझ में नहीं आता ? दिस इज नॉनसेंस हूँ..हूँ..हूँ..(हँसी)
क्या है ये ?
स्वामीजी: (एक तस्वीर की तरफ इशारा करते हुए ) ये तस्वीर किसकी है ?
मंगल सिंह : हमारे पिताजी की .
स्वामीजी : क्या तुम इस पर थूक सकते हो ?
मंगल सिंह : हमारे पिताजी पे ?
स्वामीजी : ये पिताजी कहाँ हैं ? ये तो उनकी तस्वीर है... सिर्फ एक कागज का टुकड़ा, रक्त और मांस का
पिंड नहीं.... फिर भी तुम्हें ... इस तस्वीर में, अपने पिताजी के दर्शन होते हैं... होते हैं कि नहीं ?
मंगलसिंह :  होते हैं ..... होते हैं...
स्वामीजी : महाराज मंगलसिंह जी , इसी तरह .. एक भक्त , कोई धातु ,लकड़ी, मट्टी या पत्थर के टुकड़े को
नहीं पूजता. उसमें उसे, अपने भगवान के दर्शन होते हैं.  विश्वास अंधा है , अनुभव ही सत्य है.
मंगलसिंह : (पश्चाताप करते हुए) विश्वास अंधा है .........अनुभव ही सत्य है.... स्वामीजी.. आपने मेरी आँखें
खोल दी. मेरी आँखें खोल दी, आपने स्वामीजी. 

 सूत्रधार : इस दृश्य को देखकर आप समझ ही गए होंगे कि ईश्वर... मूर्तियों में नहीं, हमारी भावनाओं में
 निवास करता है. आइये आगे चलते हैं . स्वामीजी भारत भ्रमण करते हुए अपने प्रिय खेतड़ी के महाराज
  के यहाँ पहुँचते हैं. देखते हैं अगला दृश्य ...........
 खेतड़ी-महाराज : मेरी एक प्रार्थना है ,इसे आप एक ऐसे व्यक्ति का प्रेम भी कह सकते हैं, जो सबसे अधिक आपको चाहता है, कहिये आप स्वीकार करेंगे ?
स्वामीजी : कहें तो सही महाराज.
खेतड़ी महाराज : आप मुझे बेटा बुलाइए, जैसे आप हमेशा बोलते हैं. भले ही मैं खेतड़ी का महाराज क्यों न हूँ .
आप मेरे स्वामी हैं, आपके लिए हमेशा मैं आपके पुत्र जैसे रहूँगा .
स्वामीजी :अच्छा बेटे ,कहो.
खेतड़ी महाराज : आज से आप स्वामी विवेकानंद के  नाम से पुकारे जाएँगे. क्योंकि आप आनंद और ज्ञान
के वाहक हैं. स्वामी.. यह नाम आपके अनुकूल है. कहिये आप स्वीकार करते हैं ?
स्वामीजी  : किया भाई, किया.
खेतड़ी म : मुझे मालूम था आप स्वीकार करेंगे. आप अपने स्नेही जनो की प्रार्थना कभी इंकार नहीं करते.
एक बात और है. मैंने सुना है अमरीका में  शिकागो नामक एक शहर है. वहाँ विश्व के प्रमुख धार्मिक नेताओं का एक बहुत बड़ा सम्मलेन हो रहा है.... ये धर्म की एक बहुत बड़ी महासभा होगी. स्वामी, आप अक्सर कहा
करते हैं कि आज इस बात की ज़रूरत है कि दुनिया भारत को अध्यात्म की भूमि के रूप में स्वीकार करे.
आपको वहाँ जाकर भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहिए.
स्वामीजी : मैं ! अमेरिका में, धर्म-महासभा ! किन्तु ....
खेतड़ी महाराज : किन्तु की कोई बात नहीं,मैं हर चीज़ का प्रबंध कर दूँगा. सिर्फ आप ही हैं जो दुनिया को समझा सकते हैं कि सच्चा धर्म क्या है ? और हमारी प्राचीन धरती को क्या प्रदान करना है. आपने मुझे
बड़ी अच्छी तरह से समझाया.अब आप सारे विश्व को समझाइए. स्वामी ये बहुत बढ़िया अवसर है. सारी
दुनिया को अपने विचारों का उपहार दें. इनकार न करें स्वामी......
स्वामीजी : लेकिन... मुझे नहीं पता कि मैं इस कार्य के योग्य हूँ भी या .....
खेतड़ी महाराज :आप ! योग्य नहीं हैं, स्वामी विवेकानंद योग्य नहीं हैं. आप, सिर्फ आप ही हैं ये काम कर  सकते हैं. मैं यह अच्छे से जानता हूँ और शीघ्र ही सारा संसार जान जाएगा. अच्छा,..अगर आपकी आज्ञा हो, तो
आज मैंने आपके मनोरंजन के लिए कुछ प्रबंध किया है ......( ताली की आवाज़)
 ( नर्तकी का प्रवेश )
स्वामीजी : मुझे क्षमा करना बेटे,..... मैं दूसरे कमरे में रहना चाहूँगा. एक संन्यासी के लिए ,इस तरह के
मनोरंजन की आज्ञा नहीं है.
                           (नृत्य एवं गीत की शुरुआत )
नर्तकी : गीत : हमारे प्रभु अवगुण चित न धरो -२
             समदर्शी है, नाम तुम्हारो -२
                सोई पार  करो ..
          हमारे  प्रभु अवगुण चित न धरो -२
          इक नदिया ,इक नाल कहावत -२
              मैलो नीर भरो-२
         जब मिल गए तब एक बरन भये
             गंगा नाम परयो
       हमारे प्रभु, अवगुण चित न धरो
       हमारे प्रभु, अवगुण चित न धरो.
       हो....हो.....
      तन माया जो ब्रह्म कहावत -२
      सूर सु मिल बिधरो
      के इनको निर्धार कीजिये
      कई पन जात तरो .
      हमारे प्रभु अवगुण चित न धरो
      हमारे प्रभु अवगुण चित न धरो
      हमारे प्रभु अवगुण चित न धरो
  ( विवेकानंद के चरणों में गिर जाती है)
स्वामीजी : हे माँ, मैंने अपराध किया है. मैं यहाँ से जाने के लिए उठ खड़ा हुआ था. मैंने आपका अपमान किया. लेकिन आपके गीत ने मेरी चेतना को जगा दिया. भगवान के सामने पवित्र अपवित्र मनुष्य जैसी
कोई बात नहीं होती. किसी की निंदा नहीं करता. मुझे क्षमा करें .
नर्तकी : ( भाव-विभोर होकर) स्वामी !
सूत्रधार : बड़ा ही भावुक दृश्य था . वास्तव में ईश्वर की नज़र में सब बराबर हैं हम मनुष्य ही स्वार्थ के वश में समाज को बाँटने का काम करते हैं. विद्वता दूसरों को छोटा समझने में नहीं ,अपितु स्वयं को छोटा समझने में
ही व्यक्त होती है. खेतड़ी के महाराज के आग्रह पर स्वामी विवेकानंद शिकागो जाते हैं. क्योंकि वहाँ वे बिना
आमंत्रण गए थे इसलिए उन्हें धाम-संसद में भाग लेने अनुमति नहीं मिली. बड़ी मुश्किल से एक अँगरेज़
विद्वान के सहयोग से उन्हें यह अवसर प्राप्त हुआ. शिकागो की धर्म-संसद में दुनियाभर के विद्वानों के बीच स्वामी विवेकानंद ने किस प्रकार भारतीय संस्कृति का परचम लहराया .अगले दृश्य में देखते हैं...........
                           (शिकागो -भाषण दृश्य)

कार्यक्रम संचालक :

           (शिकागो –भाषण)



         
   







रविवार, 15 जनवरी 2012

मकर संक्रांति


मकर संक्रांति


·
मकर संक्रांति

अनुयायी
हिन्दू धर्मावलम्बी
उद्देश्य
मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान और तिल दान करने का विशेष महात्मय होता है।
प्रारम्भ
पौराणिक
तिथि
14 या 15 जनवरी
उत्सव
यह दिन सुन्दर पतंगों को उड़ाने का दिन भी माना जाता है। लोग बड़े उत्साह से पतंगें उड़ाकर पतंगबाज़ी के दाँव–पेचों का मज़ा लेते हैं।
अनुष्ठान
इस दिन कहीं खिचड़ी तो कहीं चूड़ादही[1] का भोजन किया जाता है तथा तिल के लड्डू बनाये जाते हैं। ये लड्डू मित्र व सगे सम्बन्धियों में बाँटें भी जाते हैं।
धार्मिक मान्यता
हिन्दू धर्म
संबंधित लेख
पोंगल, लोहड़ी
अन्य जानकारी
मकर संक्रांति के दिन सूर्यदक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश कर जाता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को उत्तरायण कहते हैं।
अद्यतन‎
13:08, 15 जनवरी 2012 (IST)
मकर संक्रान्ति प्रत्येक वर्ष जनवरी महीने में समस्त भारत में मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होता है, जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। परम्परा से यह विश्वास किया जाता है कि इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह वैदिक उत्सव है। इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़–तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बांटा जाता है।
संस्कृत प्रार्थना के अनुसार "हे सूर्यदेव, आपका दण्डवत प्रणाम, आप ही इस जगत की आँखें हो। आप सारे संसार के आरम्भ का मूल हो, उसके जीवन व नाश का कारण भी आप ही हो।" सूर्य का प्रकाश जीवन का प्रतीक है। चन्द्रमा भी सूर्य के प्रकाश से आलोकित है। वैदिक युग में सूर्योपासना दिन में तीन बार की जाती थी। पितामह भीष्मने भी सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपना प्राणत्याग किया था। हमारे मनीषी इस समय को बहुत ही श्रेष्ठ मानते हैं। इस अवसर पर लोग पवित्र नदियों एवं तीर्थस्थलों पर स्नान कर आदिदेव भगवान सूर्य से जीवन में सुख व समृद्धि हेतु प्रार्थना व याचना करते हैं।

मान्यता

यह विश्वास किया जाता है कि इस अवधि में देहत्याग करने वाले व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।महाभारत महाकाव्य में वयोवृद्ध योद्धा पितामह भीष्म पांडवों और कौरवों के बीच हुए कुरुक्षेत्र युद्ध में सांघातिक रूप से घायल हो गये थे। उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। पांडव वीर अर्जुन द्वारा रचित बाणशैया पर पड़े वे उत्तरायण अवधि की प्रतीक्षा करते रहे। उन्होंने सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर ही अंतिम सांस ली जिससे उनका पुनर्जन्म न हो।

सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व

जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है, उस अवधि को "सौर वर्ष" कहते हैं। पृथ्वी का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना "क्रान्तिचक्र" कहलाता है। इस "परिधि चक्र" को बाँटकर बारह राशियाँ बनी हैं। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना "संक्रान्ति" कहलाता है। इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को "मकरसंक्रान्ति" कहते हैं।
सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना उत्तरायण तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना दक्षिणायन है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं। दक्षिणायन में ठीक इसके विपरीत होता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन देवताओं की रात होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता था। मकर–संक्रान्ति के दिन यज्ञ में दिये हव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएँ शरीर छोड़कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसलिए यह आलोक का अवसर माना जाता है। इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्त्व है और सौ गुणा फलदायी होकर प्राप्त होता है। मकर संक्रान्ति प्रत्येक वर्ष प्रायः 14 जनवरी को पड़ती है।

आभार प्रकट करने का दिन

पंजाब, बिहार व तमिलनाडु में यह समय फ़सल काटने का होता है। कृषक मकर संक्रान्ति को आभार दिवस के रूप में मनाते हैं। पके हुए गेहूँ और धान को स्वर्णिम आभा उनके अथक मेहनत और प्रयास का ही फल होती है और यह सम्भव होता है, भगवान व प्रकृति के आशीर्वाद से। विभिन्न परम्पराओं व रीति–रिवाज़ों के अनुरूप पंजाब एवं जम्मू–कश्मीर में "लोहड़ी" नाम से "मकर संक्रान्ति" पर्व मनाया जाता है। सिन्धी समाज एक दिन पूर्व ही मकर संक्रान्ति को "लाल लोही" के रूप में मनाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रान्ति पोंगल के नाम से मनाया जाता है, तो उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी के नाम से मकर संक्रान्ति मनाया जाता है। इस दिन कहीं खिचड़ी तो कहीं चूड़ादही का भोजन किया जाता है तथा तिल के लड्डु बनाये जाते हैं। ये लड्डू मित्र व सगे सम्बन्धियों में बाँटें भी जाते हैं।

खिचड़ी संक्रान्ति

चावल व मूंग की दाल को पकाकर खिचड़ी बनाई जाती है। इस दिन खिचड़ी खाने का प्रचलन व विधान है। घी व मसालों में पकी खिचड़ी स्वादिष्ट, पाचक व ऊर्जा से भरपूर होती है। इस दिन से शरद ऋतु क्षीण होनी प्रारम्भ हो जाती है। बसन्त के आगमन से स्वास्थ्य का विकास होना प्रारम्भ होता है।

तिल संक्रान्ति

मकर संक्रान्ति के दिन, खिचड़ी के साथ–साथ तिल का प्रयोग भी अति महत्त्वपूर्ण है। तिल के गोल–गोल लड्डू इस दिन बनाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई है तथा उपरोक्त उत्पादों का प्रयोग हमें सभी प्रकार के पापों से मुक्त करता है; गर्मी देता है और निरोग रखता है।
इस दिन गंगा स्नान व सूर्योपासना के बाद ब्राह्मणों को गुड़, चावल और तिल का दान भी अति श्रेष्ठ माना गया है। महाराष्ट्र में ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रान्ति से सूर्य की गति तिल–तिल बढ़ती है, इसीलिए इस दिन तिल के विभिन्न मिष्ठान बनाकर एक–दूसरे का वितरित करते हुए शुभ कामनाएँ देकर यह त्योहार मनाया जाता है।

संक्रान्ति दान और पुण्यकर्म का दिन

संक्रान्ति काल अति पुण्य माना गया है। इस दिन गंगा तट पर स्नान व दान का विशेष महत्त्व है। इस दिन किए गए अच्छे कर्मों का फल अति शुभ होता है। वस्त्रों व कम्बल का दान, इस जन्म में नहीं; अपितु जन्म–जन्मांतर में भी पुण्यफलदायी माना जाता है। इस दिन घृत, तिल व चावल के दान का विशेष महत्त्व है। इसका दान करने वाला सम्पूर्ण भोगों को भोगकर मोक्ष को प्राप्त करता है - ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
उत्तर प्रदेश में इस दिन तिल दान का विशेष महत्त्व है। महाराष्ट्र में नवविवाहिता स्त्रियाँ प्रथम संक्रान्ति पर तेल, कपास, नमक आदि वस्तुएँ सौभाग्यवती स्त्रियों को भेंट करती हैं। बंगाल में भी इस दिन तिल दान का महत्त्व है। राजस्थान में सौभाग्यवती स्त्रियाँ इस दिन तिल के लड्डू, घेवर तथा मोतीचूर के लड्डू आदि पर रुपये रखकर, "वायन" के रूप में अपनी सास को प्रणाम करके देती है तथा किसी भी वस्तु का चौदह की संख्या में संकल्प करके चौदह ब्राह्मणों को दान करती है।

पतंग उड़ाने का दिन

यह दिन सुन्दर पतंगों को उड़ाने का दिन भी माना जाता है। लोग बड़े उत्साह से पतंगें उड़ाकर पतंगबाज़ी के दाँव–पेचों का मज़ा लेते हैं। बड़े–बड़े शहरों में ही नहीं, अब गाँवों में भी पतंगबाज़ी की प्रतियोगिताएँ होती हैं।

गंगास्नान व सूर्य पूजा



मकर संक्राति के अवसर पर गंगास्नान करते श्रद्धालु
पवित्र गंगा में नहाना व सूर्य उपासना संक्रान्ति के दिन अत्यन्त पवित्र कर्म माने गए हैं। संक्रान्ति के पावन अवसर पर हज़ारों लोग इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम, वाराणसी में गंगाघाट, हरियाणा में कुरुक्षेत्र, राजस्थान में पुष्कर, महाराष्ट्रके नासिक में गोदावरी नदी में स्नान करते हैं। गुड़ व श्वेत तिल के पकवान सूर्य को अर्पित कर सभी में बाँटें जाते हैं। गंगासागर में पवित्र स्नान के लिए इन दिनों श्रद्धालुओं की एक बड़ी भीड़ उमड़ पड़ती है।

पुण्यकाल के शुभारम्भ का प्रतीक

मकर संक्रान्ति के आगामी दिन जब सूर्य की गति उत्तर की ओर होती है, तो बहुत से पर्व प्रारम्भ होने लगते हैं। इन्हीं दिनों में ऐसा प्रतीत होता है कि वातावरण व पर्यावरण स्वयं ही अच्छे होने लगे हैं। कहा जाता है कि इस समय जन्मे शिशु प्रगतिशील विचारों के, सुसंस्कृत, विनम्र स्वभाव के तथा अच्छे विचारों से पूर्ण होते हैं। यही विशेष कारण है, जो सूर्य की उत्तरायण गति को पवित्र बनाते हैं और मकर संक्रान्ति का दिन सबसे पवित्र दिन बन जाता है।

खगोल का गणित

सन 2012 में मकर संक्रांति 15 जनवरी यानी रविवार की है। अगले 68 सालों तक यह पर्व 15 जनवरी को ही पड़ेगा। राजा हर्षवर्द्धन के समय में यह पर्व 24 दिसंबर को पड़ा था। अकबर के शासनकाल में 10 जनवरी को मकर संक्रांति थी। शिवाजी के जीवनकाल में यह त्योहार 11 जनवरी को पड़ा था।

आखिर ऐसा क्यों?

सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रांति कहा जाता है। साल 2012 में यह 14 जनवरी की मध्यरात्रि में है। इसलिए उदय तिथि के अनुसार मकर संक्रांति 15 जनवरी को पड़ेगी। दरअसल हर साल सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश 20 मिनट की देरी से होता है। इस तरह हर तीन साल के बाद सूर्य एक घंटे बाद और हर 72 साल एक की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है। मतलब 1728 (72 गुणे 24) साल में फिर सूर्य का मकर राशि में प्रवेश एक दिन की देरी से होगा और इस तरह 2080 के बाद मकर संक्रांति 16 जनवरी को पड़ेगी।

ज्योतिषीय आकलन

ज्योतिषीय आकलन के अनुसार सूर्य की गति प्रतिवर्ष 20 सेकेंड बढ़ रही है। माना जाता है कि आज से 1000 साल पहले मकर संक्रांति 31 दिसंबर को मनाई जाती थी। पिछले एक हज़ार साल में इसके दो हफ्ते आगे खिसक जाने की वजह से 14 जनवरी को मनाई जाने लगी। अब सूर्य की चाल के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 5000 साल बाद मकर संक्रांति फ़रवरी महीने के अंत में मनाई जाएगी।[2]

विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति

मकर संक्रान्ति भारत के भिन्न-भिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थ रखती है। किन्तु सदा की भॉंति, नानाविधी उत्सवों को एक साथ पिरोने वाला एक सर्वमान्य सूत्र है, जो इस अवसर को अंकित करता है यदिदीपावली ज्योति का पर्व है तो संक्रान्ति शस्य पर्व है, नई फ़सल का स्वागत करने तथा समृद्धि व सम्पन्नता के लिए प्रार्थना करने का एक अवसर है।

पंजाब में लोहड़ी


मकर संक्रान्ति भारत के अन्य क्षेत्रों में भी धार्मिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पंजाब में इसे लोहड़ी कहते हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में नई फ़सल की कटाई के अवसर पर मनाया जाता है। पुरुष और स्त्रियाँ गाँव के चौक पर उत्सवाग्नि के चारों ओर परम्परागत वेशभूषा में लोकप्रिय नृत्य भांगड़ा का प्रदर्शन करते हैं। स्त्रियाँ इस अवसर पर अपनी हथेलियों और पाँवों पर आकर्षक आकृतियों में मेहन्दी रचती हैं।

बंगाल में मकर-सक्रांति

पश्चिम बंगाल में मकर सक्रांति के दिन देश भर के तीर्थयात्री गंगासागर द्वीप पर एकत्र होते हैं, जहाँ गंगा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। एक धार्मिक मेला, जिसे गंगासागर मेला कहते हैं, इस समारोह की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस संगम पर डुबकी लगाने से सारा पाप धुल जाता है।

कर्नाटक में मकर-सक्रांति

कर्नाटक में भी फ़सल का त्योहार शान से मनाया जाता है। बैलों और गायों को सुसज्जित कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है। नये परिधान में सजे नर-नारी, ईख, सूखा नारियल और भुने चने के साथ एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। पंतगबाज़ी इस अवसर का लोकप्रिय परम्परागत खेल है।

गुजरात में मकर-सक्रांति

गुजरात का क्षितिज भी संक्रान्ति के अवसर पर रंगबिरंगी पंतगों से भर जाता है। गुजराती लोग संक्रान्ति को एक शुभ दिवस मानते हैं और इस अवसर पर छात्रों को छात्रवृतियाँ और पुरस्कार बाँटते हैं।

केरल में मकर-सक्रांति

केरल में भगवान अयप्पा की निवास स्थली सबरीमाला की वार्षिक तीर्थयात्रा की अवधि मकर संक्रान्ति के दिन ही समाप्त होती है, जब सुदूर पर्वतों के क्षितिज पर एक दिव्य आभा ‘मकर ज्योति’ दिखाई पड़ती है।